Thursday, March 10, 2016

मन की मानो, मन से मत मनवाओ!


     एक गाँव में कालू नामक बढ़ई रहता था। एक दिन उसकी पत्नी बोली-सुनो जी, आज मैं टमाटर की लौंजी बनाना चाहती हूँ। इसलिए बाज़ार से जाकर टमाटर खरीद लाओ। कालू झोला लेकर बाज़ार की ओर चल दिया। रास्ते में उसकी नज़र टमाटर के एक खेत पर पड़ी। लाल-लाल टमाटरों को देखकर उसने सोचा कि क्यों न यहीं से टमाटर ले जाऊँ। खेत में जाकर जैसे ही उसने टमाटर तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, उसके मन ने कहा कि यह तो चोरी है। चोरी करना पाप है। उसने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया। अब वह क्या करे। तभी उसे एक उपाय सूझा। वह बड़ी ही विनम्रता से खेत से बोला-खेत भैया, खेत भैया, मेरी पत्नी आज टमाटर की लौंजी बनाना चहती है। यदि आपकी इजाज़त हो तो मैं एक-दो टमाटर तोड़ लूँ। कुछ देर रुकने के बाद उसने खेत की ओर से खुद ही उत्तर दे दिया। हाँ-हाँ, कालू भाई, पूरा खेत ही आपका है। एक-दो क्यों झोला भरकर टमाटर ले जाओ। खेत से अनुमति मिलने पर बढ़ई ने तेज़ी से अच्छे-अच्छे टमाटर तोड़कर अपने झोले में भर लिए और घर चल दिया। कछ समय बाद उसकी पत्नी ने उसे फिर से टमाटर लाने को कहा। इस पर वह खुशी-खुशी दोबारा उस खेत में जा पहुँचा और वही कहानी दोहरा दी। और फिर तो यह कहानी गाहे-बगाहे दोहराई जाने लगी।
     उस खेत का मालिक किसना बहुत मेहनती किसान था। एक दिन खेत में घूमते समय उसे शक हुआ कि हो न हो कोई उसके खेत से टमाटर चुरा रहा है। इस पर उसने खेत की चौकसी बढ़ा दी। एक दिन उसने कालू को रंगेहाथों पकड़ लिया और उसका गिरेबान पकड़कर सीधे गाँव के तालाब पर ले गया। वहाँ किसना ने तालाब की ओर देखकर कहा-तालाब काका, तालाब काका, मैं इस चोर को आपके सहयोग से सजा देना चाहता हूँ। क्या मैं इसको एक-दो डुबकी लगवा दूँ। कुछ देर रुकने के बाद वह खुद बोला-क्यों नहीं किसना, इस बदमाश को एक-दो क्यों पूरी सौ-दो सौ डुबकी लगवाओ। तालाब की अनुमति मिलने के बाद उसने वैसा ही किया।
     दोस्तो, इसे कहते हैं जैसे को तैसा। निश्चित ही इसके बाद कालू को सबक मिल गया होगा कि इस तरह से मन को बहलाने से पाप पुण्य में नहीं बदलता। लेकिन कालू ने ही ऐसा किया हो, ऐसा नहीं है। हममें से भी बहुत से लोग अकसर इस तरह की हरकतें करते रहते हैं। यकीन नहीं हो रहा न। अरे भई, जब आप अपने मन की न मानकर उससे अपनी बात मनवाते हैं या यूँ कहें कि मन की न सुनकर उससे अपनी मनचाही कहलवाते हैं तो यह क्या हुआ? यह भी तो वही हुआ जो वह बढ़ई कर रहा था। ऐसे ही बहुत से लोग जो यह सोचते हैं कि उन्होने जो कुछ भी किया वह अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ पर किया, अपने मन की सुनकर किया। मन की सुनना कोई गलत बात नहीं है। ऐसा सोचने वाले तभी सही ठहराए जा सकते हैं जबकि वे वास्तव में वैसा ही करते जैसा कि उनका मन कह रहा था। उन्होंने मन की मानने की बजाय उसे तो डरा-धमकाकर, बहला-फुसलाकर या फिर उलटे-सीधे तर्क और दलीलें देकर चुप ही करा दिया था। और उसकी चुप्पी को अऩुमति मानकर चल पड़े गलत राह पर। यानी यहाँ मन का दोष नहीं, दोष है आपकी धौंस का, जिसके चलते मन ने कुछ भी कहने से मना कर दिया। इस तरह न जाने कितने लोग अपने अपराधों को, अपने पापों को या किसी गलत काम को उलटे-सीधे तर्क या दलीलें देकर ही जायज़ ठहराते रहते हैं या ठहराते आए हैं।
     यदि आप भी अपने गोरख-धंधों को इसी तरह जायज़ करार देते हैं और यह सब करके भी आपको लगता है कि आप सुखी रह पाएँगे तो यह आपकी गलतफहमी है। आज भले ही आपको इस बात का अहसास न हो लेकिन एक न एक दिन ज़रूर होगा कि आपकी लाख कोशिशों के बाद भी आपके मन ने आपकी किसी भी दलील को नहीं माना। तभी वह खामोश रहकर भी वक्त-बेवक्त आपके द्वारा किए गए गलत कामों के लिए आपको कचोटता रहता है। इसलिए बेहतर यही है कि मन की चुप्पी को उसकी मूक सहमति न मानें। यदि आप मन से मनमानी करेंगे तो अंदर ही अंदर वैसे ही घुटेंगे जैसे कि गलत राह पकड़ने वाले लोग घुटते हैं। यदि आप इस घुटन से बचना चाहते हैं तो यह बात घोंटकर पी लें कि मन की मानना अच्छा है, मन से मनवाना बुरा। ठीक है।


Wednesday, March 9, 2016

आती हैं कई भाषा तो काहे की निराशा


     एक बार चीन में एक बहेलिए ने दुर्लभ जाति के छः रंग-बिरंगे तोते पकड़े। उसने नगर में ले जाकर उन्हें एक व्यापारी को बेच दिया। उस व्यापारी की वहाँ के राजा से घनिष्ठ मित्रता थी। उसके मन में विचार आया कि इन तोतों को राजा को भेंट कर देता हूँ। निश्चित ही उन्हें यह उपहार पसंद आएगा। वह अपने विचार पर अमल करने की सोच ही रहा था कि तभी उसे ध्यान आया कि राजा बड़ा ही अंधविश्वासी है। चूँकि वहाँ पर कोई भी चीज़ छः की संख्या में लेना-देना अपशकुन माना जाता था, इसलिए उसने एक जापानी तोता उनके साथ मिला दिया। इस प्रकार सात तोते हो गए और यह एक शुभ अंक था।
     इसके बाद उसने वे तोते ले जाकर राजा को भेंट कर दिए। राजा को व्यापारी का उपहार बहुत पसंद आया। वह ध्यान से एक-एक तोते को देखता और व्यापारी से उसकी प्रशंसा  करता। अंत में उसकी नज़र जापानी तोते पर पड़ी। वह बोला-अरे, यह तोता तो जापानी लगता है। क्या ये सब अपने यहाँ के तोते नहीं हैं? राजा की बात सुनकर व्यापारी की समझ में नहीं आया कि अब वह क्या कहे। यदि वह कहता है कि एक अलग है तो फिर चीनी तोते संख्या में छः हो जाएँगे और झूठ वह राजा से बोलना नहीं चाहता था। उसकी हिम्मत ही नहीं हो रही थी कुछ कहने की। राजा ने दोबारा अपना प्रश्न दोहराया तो इसके पहले कि व्यापारी कुछ कहता, जापानी तोता चीनी भाषा में बोला-महाराज, मैं चीन का भी हूँ और जापान का भी क्योंकि मैं दोनों भाषाएँ जानता हूँ यानी एक दुभाषिया हूँ।
     दोस्तो, यह होता है दुभाषिया होने का फायदा कि आप सामने वाले से उसी की भाषा में बात कर सकते हैं और वह आपसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। फिर तो वह भूल जाएगा कि आप कौन और कहाँ के हैं। आप तो उसे अपने लगेंगे। इसलिए कहा भी गया है कि सामने वाले से जल्दी सामंजस्य बैठाना चाहते हो तो उससे उसी की भाषा में, उसी की बोली में बात करो। तब आपकी बात वह ज्यादा ध्यान और अपनत्व से सुनेगा-समझेगा यानी सामने वाले की भाषा का ज्ञान आपके काम को आसान बना देगा, बना देता है।
     वैसे भी कुछ नया और हटकर सीखने में बुराई भी नहीं होती। यदि आप कोई दूसरी भाषा सीखेंगे तो इसके आपके ज्ञान और सोच में वृद्धि ही होगी। तब आप एक ही विषय पर अलग-अलग तरीके से मंथन कर पाएँगे। साथ ही आपके संबंधों का दायरा भी बढ़ेगा। एक से अधिक भाषा जानने से आपके शब्दकोश में बहुत से नए-नए शब्द जुड़ते जाते हैं। ये शब्द कहीं न कहीं काम आते ही रहते हैं। इसलिए जितना ज्यादा हो सके, उतने नए-नए शब्द सीखें, उन्हें एड करें। कहते हैं कि यदि आप रोम में हैं तो रोमन की तरह व्यवहार करें। यह ठीक है, लेकिन बिना रोमन भाषा जाने वहाँ के निवासी की तरह व्यवहार कैसे किया जा सकता है। यानी आप किसी दूसरी भाषा वाले क्षेत्र में तभी घुल-मिलकर सफल हो सकते हैं जब आप वहाँ की बोली में बात कर सकें। वरना सामने वाला आपसे बात कर रहा है और आपकी बोलती बंद।
     यह बात कई रिसर्च से साबित भी हुई है कि किसी व्यक्ति से उसी की भाषा में बात की जाए तो संदेश की ग्रहणशीलता और उसी के अऩुरूप प्रतिक्रिया की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यही कारण है कि आज लगभग हर छोटी-बड़ी कंपनी लोगों तक अपना संदेश या अपने उत्पादों की जानकारी उन्हीं की भाषा में पहुँचाना चाहती है। यह इसलिए भी ज़रूरी हो गया है कि आज का दौर ग्लोबलाइजेशन का है। ऐसे में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ किसी दूसरे देश में जाकर तभी सफल हो सकती हैं जब उनका कामकाज स्थानीय भाषा में  हो। कई बार तो इन कंपनियों के विज्ञापन देखकर अहसास ही नहीं होता कि ये किसी विदेशी कंपनी का विज्ञापन या उत्पाद है। अपनी भाषा में होने के कारण ही वह हमें अपील करता है। स्थानीय भाषा के इसी बढ़ते महत्व के कारण उन लोगों का बोलबाला हो गया है जो अपनी भाषा के साथ ही कोई दूसरी भाषा या बोली भी जानते हैं। उनके लिए इन कंपनियों में अपार संभावनाएँ हैं। इसलिए यदि आप भी अपने करियर में बहुत कुछ करना चाहते हैं तो कोशिश करें कि अपनी भाषा के अलावा कोई और भाषा भी सीखें। इससे आपके करियर में अवसरों की वृद्धी ही होगी और दुभाषिए होने के बाद आप कभी हाशिए पर नहीं जाएँगे।

Monday, March 7, 2016

हाथ ऊपर उठें।

ऐसा करो कि हाथ ऊपर उठें, ऊपर न उठें!
     न्यूरेमबर्ग के पास के एक गाँव में एक गरीब सुनार अपने अठारह बच्चों वाले परिवार का भरण-पोषण बड़ी मुश्किल से करता था। यह बात उसके बच्चे जानते थे। इसी कारण उसके दो बड़े बेटे अल्ब्रोट और अल्ब्रोच उदास रहते थे। वे कला के क्षेत्र में उच्च शिक्षा ग्रहण करना चाहते थे, लेकिन तंगहाली के चलते यह संभव न था। एक रात अल्ब्रोच अपने भाई से बोला-इस तरह हमारा सपना कभी पूरा नहीं होगा हमें कुछ करना चाहिए।
     इस पर दोनों ने तय किया कि वे सिक्का उछालकर अपने भाग्य का फैसला करेंगे। जो हारेगा वह न्यूरेमबर्ग के पास की खदान में काम करके जीते हुए भाई की पढ़ाई में आने वाला पूरा खर्च उठाएगा। और चार साल बाद जब उसकी पढ़ाई पूरी हो जाएगी तब वह दूसरे भाई को उसका सपना पूरा करने में मदद करेगा। यह तय होने के बाद सिक्का उछाला गया। इसमें अल्ब्रोच की जीत हुई। उसने न्यूरेमबर्ग जाकर कला अकादमी में दाखिला ले लिया और अल्ब्रोट खदान में काम करने लगा।
     दोनों भाई अपने-अपने क्षेत्र में जी-तोड़ मेहनत कर रहे थे। अल्ब्रोट इसलिए ताकि उसके भाई को पैसे की कमी न हो और अल्ब्रोच इसलिए कि उसके भाई की मेहनत बेकार न जाए। अल्ब्रोच का पैतृक व्यवसाय चूँकि सुनारी का था, इसलिए उसके अंदर रचनात्मकता पैतृक गुणों के रूप मे मौजूद थी। वह जो भी कलाकृति बनाता वह अनोखी होती थी। फिर भले ही वह तैलचित्र हो, नक्काशी का काम हो या लकड़ी की बनी वस्तुएँ। इस तरह पढ़ाई पूरी करते-करते वह एक स्थापित कलाकार बन गया। उसे काम भी खूब मिलने लगा। पढ़ाई पूरी कर जब वह गाँव पहुँचा तो सभी ने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया। सभी उसकी तारीफों के पुल बाँध रहे थे। तब अल्ब्रोच बोला-तारीफ के काबिल मैं नहीं, मेरा भाई है। आज मैं जो कुछ हूँ, उसी की बदौलत। इसके बाद वह अल्बर्ट की ओर मुड़कर बोला-भाई, अब तुम्हारी बारी है। अब तुम न्यूरेमबर्ग जाकर अपना सपना पूरा करो। इस पर अल्बर्ट भाव-विभोर हो उठा। उसके आँसू बह निकले। सिसकियाँ लेते हुए वह बोला-नहीं, अल्ब्रोच! अब यह संभव नहीं। अब बहुत देर हो चुकी है। खदान में काम करते-करते मेरे हाथ इतने रूखे हो गए हैं कि अब यह हथौड़ा ही उठा सकते हैं, ब्राश नहीं।
     दोस्तो, वह कलाकार भाई था अल्ब्रोच ड¬ूरेर, जिसकी बनाई अनेक कलाकृतियाँ आज लगभग 500 साल बाद भी विश्व के कई मयूजियमों की शोभा बढ़ा रही हैं। लेकिन उसकी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति है आकाश की ओर उन्मुख रूखे, खुरदुरे, पतली-पतली अँगुलियों वाले हाथ। इस मास्टरपीस को लोगों ने नाम दिया है "प्रेर्इंग हैंड्स' यानी प्रार्थनारत हाथ। ये हाथ अल्ब्रोच ने इसलिए बनाए थे ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जब भी इस पेंटिंग को देखें तो वे अल्ब्रोच की तारीफ करते समय यह न भूलें कि उसकी सफलता के पीछे किसी और का भी हाथ था। इस पेंटिंग का निर्माण सिर्फ उसने नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से अल्ब्रोट ने भी किया था।
     वैसे हम सबको भी सफलता सिर्फ अपने हाथों की बदौलत हासिल नहीं होती, बल्कि उसमें कई और भी हाथ होते हैं। कुछ हाथ ऐसे होते हैं जो हमारे लिए दुआ करते हैं, प्रार्थना करते हैं। कुछ हाथ सहयोग, सहायता के रहते हैं। कुछ हाथ हमारी पीठ थपथपाकर हमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, तो कुछ हाथ आशीर्वाद के रूप में हमारे सिर पर रखे होते हैं। कुछ हाथों की अँगुली पकड़कर हम आगे बढ़ते चले जाते हैं, तो कुछ हाथ बराबरी के होते हैं जो मिलकर बड़े से बड़े और कठिन से कठिन काम को आसानी से अंजाम दे देते हैं। इस तरह हम सबकी सफलता में हमारे ही नहीं औरों के भी हाथ होते हैं। हम सबको उन हाथों के योगदान को अल्ब्रोच ड¬ूरेर की तरह ही याद रखना चाहिए। इस तरह आप उन हाथों के अहसान को तो नहीं उतार सकते, लेकिन उनके योगदान को याद रखकर उनके प्रति एक आदर और स्नेह का एक भाव तो रख ही सकते हैं। इससे वे हाथ और भी उत्साह से आपके साथ रहेंगे, आपके लिए उठेंगे। यदि आप उन हाथों को भूल जाएँगे तो फिर वे आपके लिए नहीं बल्कि आपके ऊपर उठेंगे। यह तभी संभव है, जब आप सभी को साथ लेकर सभी के साथ चलेंगे।

Saturday, March 5, 2016

गुरु पर न आजमाएँ गुरु से सीखें गुर


     पहलवानी सीख रहे शागिर्दों में से एक शागिर्द उस्ताद का बहुत चहेता था। वह उस्ताद की सारी बातें मानता था। और उसके अंदर सीखने की भी बहुत ललक थी। इस सबके चलते उस्ताद ने उसे सारे दाँव-पेंच सिखा दिए, जिनके सहारे जल्द ही उसने पहलवानी की दुनियाँ में खूब नाम कमा लिया। वह देखते ही देखते चुटकियों में अपने प्रतिद्वंद्वी को धूल चटा देता था। इससे उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई।
     इससे प्रभावित होकर बादशाह ने उसे मिलने के लिए बुलाया। शुरुआती गुफ्तगू के बाद वह बादशाह से बोला- हुज़ूर! आज पूरी दुनियाँ में कोई पहलवाल मेरे सामने नहीं ठहरता।' बादशाह ने पूछा, "क्या वाकई में ऐसा है?' शागिर्द बोला- हाँ।' बादशाह ने पूछा- क्या तुम्हारे उस्ताद भी नहीं?' शागिर्द ने जवाब दिया," हाँ वे भी नहीं।' बादशाह ने कहा," क्या तुमने कभी उस्ताद से मुकाबला किया है?' शागिर्द ने कहा, "नहीं। लेकिन जब दुनियाँ के बड़े-बड़े बल्लम मेरे सामने नहीं टिके तो वे कैसे टिक पाएँगे।' शागिर्द की बातें सुनकर बादशाह समझ गए कि इसे अपनी कामयाबी का गुरूर हो गया है। वे बोले- हम तुम्हें नूर-ए-मुल्क का खिताब देना चाहते हैं। लेकिन इसके लिए तुम्हें अपने उस्ताद को पछाड़ना होगा।' शागिर्द तैयार हो गया। दंगल वाले दिन सभी एक मैदान में जमा हो गए। सबको यकीन था कि शागिर्द के आगे उस्ताद ठहर नहीं पाएगा। देखते ही देखते दोनों भिड़ गए। लेकिन ये क्या! उस्ताद ने एक दाँव मारा और शागिर्द चारों खाने चित्त। सभी दर्शक हैरानी से उसे धूल चाटते हुए देखने लगे। बादशाह खुशी से नाच उठा, क्योंकि उसे भरोसा था कि ऐसा ही होगा। इस पर उस्ताद बादशाह से बोला- हुज़ूर! इस हार में इसकी नहीं, मेरी ही गलती है, क्योंकि यह दाँव मैने अभी तक इसे सिखाया ही नहीं था। सच कहूँ तो आज के जैसे ही दिन के लिए बचा रखा था।' उस्ताद की बातें सुन शागिर्द पानी-पानी हो गया।
     दोस्तो, इसीलिए कहते हैं कि उस्ताद से उस्तादी नहीं करनी चाहिए। क्योंकि करोगे तो नतीज़ा ऐसा ही रहेगा यानी मुँह की खाओगे। वह आपको एक ही दाँव में धूल चटा देगा, क्योंकि आप जो भी दाँव-पेंच जानते होंगे, वह आपने उसी से तो सीखे होंगे। जब वही दाँव आप उस पर आजमाएँगे तो वह तो पहले से ही उसके लिए तैयार रहेगा और आपका दाँव बेकार चला जाएगा। इसके बाद वह ऐसा दाँव मारेगा जो आप जानते भी नहीं होंगे और आप चारों खाने चित्त हो जाएँगे यानी नतमस्तक हो जाएँगे। इसलिए दुनियाँ से पंगा ले लो, लेकिन उससे कभी मत लो जिससे आपने सीखा हो, जो आपका गुरु हो। कहते भी हैं कि गुरु की विद्या गुरु पर नहीं चलाई जाती। इससे नुकसान आपका ही होता है। वैसे भी जिस गुरु से गुर सीखकर आप गुड़ से शक्कर हुए हैं, गुरूर में आकर यदि उसी गुरु पर गुर आजमाओगे तो सब गुड़-गोबर हो जाएगा।
     हम यह बात बार-बार इसलिए दोहरा रहे हैं कि अकसर लोग यह बात भूल जाते हैं। कामयाबियाँ उनके सिर चढ़कर ऐसे बोलती हैं कि वे उनका सारा श्रेय खुद ही लेने लगते हैं। यहाँ तक कि कई बार वे अपने गुरु को ही नीचा दिखाने की सोचने लगते हैं। यदि आप भी ऐसा ही कुछ करते हैं और सोचते हैं कि आप अपने गुरु से बहुत आगे निकल चुके हैं, अब आपको किसी की ज़रूरत नहीं है, तो आप गलत हैं, क्योंकि ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं है। आज सब कुछ आपके पक्ष में जा रहा है तो कल विपरीत भी जा सकता है। तब ऐसी परिस्थितियाँ खड़ी हो सकती हैं, जिनसे निपटने का आपको अनुभव नहीं होता है। ऐसे में एक गुरु, गाइड या उस्ताद ही आपके काम आता है। श्री कबीर साहिब जी ने कहा भी है- “
कबिरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और।
                   हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर।।
     अर्थात् वे लोग अंधे हैं, अज्ञानी हैं, जो गुरु को ईश्वर से कमतर आँकते हैं, जबकि ईश्वर के रूठने पर तो गुरु का आसरा मिल जाता है, लेकिन यदि गुरु रूठ जाए तो कहीं भी आसरा नहीं मिलता। और आपको ऐसे अनेक लोग मिल भी जाएँगे, जो अपनी ऐसी ही गलती की सजा भुगत रहे होंगे। यानी जिन्होंने उसी को डुबाने की कोशिश की होगी, जिसने उन्हें तैरना सिखाया। इस तरह अपनी मूर्खता के चलते वे खुद ही डूब गए। इसलिए आप कितने भी आगे बढ़ जाएँ, कभी खुद को अपने गुरु से बेहतर, उससे आगे न समझें, क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता।

Thursday, March 3, 2016

मंत्र के सहारे ही नहीं चलता तंत्र


     वाराणसी का राजपुरोहित जंगल में सम्मोहन मंत्र की सिद्धि के लिए जाप कर रहा था। तभी वहाँ से एक गीदड़ गुज़रा। वह भी झाड़ी में छिपकर मंत्र को दोहराने लगा। इधर मंत्र सिद्ध होने पर पुरोहित खुशी से चीख पड़ा कि इस मंत्र पर मेरा ही अधिकार है। तभी गीदड़ हँसता हुआ उसके सामने आया और बोला-पुरोहित जी, इस मंत्र पर मेरा भी अधिकार है। अब आप देखना मैं इस मंत्र के सहारे दुनियाँ पर राज करूंगा। इस पर पुरोहित ने उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वह भाग निकला। बाद में उस मंत्र से उसने जंगल के सभी जानवरों को अपने वश में कर लिया। यहाँ तक कि शेर जैसे खूँखार और हाथी जैसे विशालकाय जानवर भी उसकी जी-हुज़ूरी करने लगे।
     इस तरह वह जंगल का राजा बन गया। अब वह वाराणसी पर कब्ज़ा करने की सोचने लगा। एक दिन उसने दो हाथियों के ऊपर शेर को खड़ा किया और उस पर बैठकर अपनी फौज सहित वाराणसी पहुँच गया। किले को चारों ओर से घेरने के बाद उसने वहाँ के राजा को संदेश भिजवाया कि वह उसकी अधीनता स्वीकार कर ले अन्यथा मरने को तैयार हो जाए। संदेश पाकर राजा चिंतित हो गया। उसे चिंतित देखकर पुरोहित बोला-महाराज, आप परेशान न हों। उस गीदड़ से मैं निपटता हूँ। इसके बाद किले की प्राचीर पर जाकर उसने गीदड़ से पूछा कि आखिर वह नगर पर अधिकार करेगा कैसे, क्या उसे युद्ध का तरीका पता है? गीदड़ बोला- मैं शेरों से दहाड़ने को कहूँगा। इससे अफरा-तफरी मच जाएगी और मैं नगर पर अधिकार कर लूँगा। मन ही मन मुस्कुराकर पुरोहित बोला-तुम्हारी योजना अच्छी तो है लेकिन क्या ये खूँखार पशु तम्हारा आदेश मानेगे। गीदड़ पुरोहित की बातों में आ गया और उसने शेरों को दहाड़ने का आदेश दे दिया। शेरों की दहाड़ सुनकर जानवरों में अफरा-तफरी मच गई। हाथी भी घबराकर भागे जिससे उनके ऊपर खड़ा शेर और उस पर बैठा गीदड़ जमीन पर आ गिरा और हाथी के पाँव तले कुचलकर गीदड़ मर गया।
     दोस्तो, कहते हैं मंत्र से ही नहीं चलता तंत्र। लेकिन शायद उस गीदड़ को यह पता नहीं था। वह यह भी नहीं जानता था समूह बनाकर ही व्यक्ति नेता नहीं बन जाता। इसके लिए तो नेतृत्व क्षमता का होना आवश्यक है। यदि आप में नेतृत्व क्षमता ही नहीं होगी तो समूह का सही संचालन कैसे कर पाओगे। तब तो वही समूह आपके लिए विनाशकारी सिद्ध हो जाएगा, जिसका कि आप नेतृत्व कर रहे होते हैं। वैसे यह सामान्य सी बात है, लेकिन बड़ी सफलता पाने का इरादा रखने वाले कुछ लोग यह नहीं समझते। उनके लिए तो कुशल नेतृत्व का मतलब है कि बड़ी-बड़ी बातें कर लोगों को प्रभावित करना और अकसर लोग इनकी बातों में आकर इनके पीछे हो लेते हैं। इनमें कई लोग तो इनसे भी ज्यादा योग्य और क्षमतावान होते हैं। इनकी बातों से वे इतने भ्रमित हो जाते हैं कि उन्हें लगने लगता है कि उनका नेतृत्व करने के लिए इनसे बेहतर व्यक्ति कोई हो नहीं सकता, लेकिन जब कुछ करके दिखाने का समय आता है तो डींग हाँकने वाले ऐसे लोगों की पोल खुल जाती है।
     तब पता चलता है कि ये केवल बातों के धनी थे, हाथो के नहीं। तब इनकी स्थिति उस गीदड़ जैसी ही हो जाती है। यदि आप भी किसी मंत्र के सहारे या यूं कहें कि भाग्य के सहारे किसी बड़े पद को पाने में सफल हो गए हैं तो खुद का आंकलन करिए कि क्या आप उस पद से जुड़ी हुई ज़िम्मेदारियों का निर्वहन करने की स्थिति में हैं? क्या आप लोगों को साथ लेकर चल सकते हैं? यदि नहीं तो सबसे पहले अपने अंदर नेतृत्व क्षमता का विकास करें। एक अच्छा लीडर उसी को कहा जाता है जो हर परिस्थिति में अपनी टीम के अंदर उत्साह का संचार कर सके। वह अपने विवेक से चले न कि कोई उसे चलाए। क्योंकि जिसके अंदर नेतृत्व क्षमता नहीं होती वह खुद से ज्यादा दूसरों पर भरोसा करता है। वह इस गलतफहमी में रहता है कि कमान उसके हाथ में है जबकि उसकी अयोग्यता और कमजोरी का फायदा उठाकर कोई दूसरा ही उसे चला रहा होता है जैसे कि उस पुरोहित ने गीदड़ को अपने हिसाब से चला लिया। ऐसा लीडर अपना और अपनी टीम दोनों का ही नुकसान करता है। इसलिए बेहतर यह है कि लीडर बनने से पहले अपने अंदर लीडरशिप क्वालिटी पैदा की जाए। ठीक कहा न।

Wednesday, March 2, 2016

करोगे मिथ्या अभिमान तो चला जाएगा मान


     गोकुल में इंद्राज यज्ञ की तैयारियों को देखकर कृष्ण ने नंद बाबा से इंद्र की ही पूजा किए जाने का कारण पूछा। नंद बाबा बोले- बेटा, इंद्र मेघों के स्वामी हैं। वे वर्षा कर सभी को तृप्त करते हैं। उन्हीं की वजह से खेती आदि के हमारे प्रयत्न सफल होते हैं। इसलिए यज्ञ कर हम उन्हें प्रसन्न करते हैं। इस पर कृष्ण बोले-बाबा, व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार ही फल मिलते हैं, न कि किसी की पूजा-उपासना से। यदि पूजन करना ही है तो हम गोवर्धन पर्वत का करें, क्योंकि हम बनवासी हैं और हमारा भरण-पोषण वनों के माध्यम से ही होता है। कृष्ण की बात सभी को जंच गई और अन्नकूट बनाकर गोवर्धन की पूजा की गई। यह बात जब इंद्र को पता चली तो उनकी त्यौरियाँ चढ़ गर्इं। इंद्र को अपने पद का बड़ा घमंड हो गया था। उन्हें लगने लगा था कि मैं ही सर्वशक्तिशाली हूँ और सबका पालनहार हूँ। कृष्ण ने इंद्र के इसी अहंकार को दूर करने के लिए उनकी पूजा बंद कराई थी।
     तिलमिलाए इंद्र ने अपने प्रलयकारी मेघों को आदेश दिया कि गोकुल जाकर सभी कुछ बहा दो। इस पर मेघ व्रजभूमि में जाकर मूसलधार बारिश करने लगे। इससे बाढ़ की स्थिति बन गई। भयभीत लोग कृष्ण के पास पहुंचे। कृष्ण ने सभी को गोवर्धन पर्वत की शरण में जाने को कहा। कृष्ण ने वहाँ जाकर अपनी किनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन को उठा लिया। सभी लोग पर्वत के नीचे आकर बैठ गए। तब मेघों ने और तेज़ बरसना शुरू कर दिया लेकिन उनकी एक न चली। अंततः सात दिनों बाद इंद्र ने हार मान ली और मेघों को थमने का आदेश दिया। जल्दी ही सारे बादल छँट गए। कृष्ण ने सभी लोगों को बाहर निकलने को कहा। इसके बाद उन्होने पर्वत को अपने स्थान पर रख दिया। तभी इंद्र वहां आए और अपनी मूर्खता के लिए क्षमा याचना करने लगे।
     दोस्तो, इसीलिए कहते हैं कि व्यक्ति को कभी अपने पद और शक्तियों का घमंण्ड नहीं करना चाहिए क्योंकि जिन पद और शक्तियों को हासिल करके आप यह सोचते हैं कि अब सब कुछ आपके हिसाब से होगा, तो ऐसा नहीं होता। यह मिथ्या बातें हैं। इसीलिए पद और शक्तियों के अभिमान को मिथ्या अभिमान की संज्ञा दी गई है। यह अभिमान एक न एक दिन व्यक्ति के मान-मर्दन का कारण बनता ही है, जैसे कि इंद्र के लिए बना। इंद्र की ही तरह उच्च पद पर बैठे बहुत से लोगों को यह अहं हो जाता है कि सारी संस्था उनकी वजह से चल रही है, आगे बढ़ रही है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इनके पद के कारण लोगों से मिलने वाले सम्मान से इनका दिमाग खराब हो जाता है। ऐसे में "कर्म ही पूजा है' को मानने वाला कोई व्यक्ति जब इनके दरबार में हाज़िर होने की बजाय अपने काम से अपने आपको साबित करने की कोशिश करता है तो ऐसे लोग उससे चिढ़कर उसका नुकसान करने का प्रयास करने लगते हैं। ये भूल जाते हैं कि जो काम करता है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ऐसे में उस व्यक्ति का तो कुछ नहीं बिगड़ता, अभिमानी को ज़रूर अपने किए के लिए नीचा देखना पड़ता है।
     दूसरी ओर, लोग व्यक्ति की नहीं कुर्सी की पूजा करते हैं। इसलिए किसी कुर्सी पर बैठकर यह मत सोचो कि अब आप सब कुछ कर सकते हैं, आप नहीं करेंगे तो कोई नहीं कर पाएगा, यह सोच गलत है। इंद्र यही सोचते थे कि वर्षा उनकी वजह से होती है, क्योंकि मेघ उनके अधीनस्थ थे। लेकिन शास्त्रों में ऐसे अनेक उल्लेख हैं जब इंद्र को अपना आसन खोना पड़ा। लेकिन ऐसे में बारिश होना बंद नहीं हो गई थी। तब मेघ उसके अधीन आ गए जो उस समय सिंहासन पर था। फिर भले ही वह महिषासुर जैसा असुर ही क्यों न हो। इसलिए अपने पद के मद में ऐसा कुछ न करें, जिसका परिणाम आपको भुगतना पड़े।    

Tuesday, March 1, 2016

भूल ना जाना स्वयं को गिनना

     एक गाँव के बारह लोग एक साथ चारधाम यात्रा पर निकले। रास्ते में उन्हें एक नदी मिली। अब समस्या खड़ी हो गई कि नदी को पार कैसे करें, क्योंकि कोई साधन नहीं था। तभी एक व्यक्ति बोला-चलो हम सब एक-दूसरे का हाथ पकड़कर नदी पार कर लेते हैं। इसके बाद सभी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ते गए। बीच में एकाध बार उनका संतुलन भी बिगड़ा, लेकिन वे हर बार संभले और नदी पार कर ली।
     पार पहुँचने के बाद उनमें से एक बोला-चलो अब अपनी गिनती कर लेते हैं, ताकि पता चल जाए कि हममें से कोई नदी में तो नहीं बह गया। इस पर सभी ने हामी भर दी। इसके बाद सभी को एक पंक्ति में बैठाकर उसने गिनना शुरू कर दिया। वह चौंककर बोला-अरे, ये तो ग्यारह ही हैं। एक आदमी कहाँ गया? मुझे दिख तो सभी रहे हैं। ये क्या चक्कर है? कोई और गिनो। और वह दूसरे व्यक्ति को खड़ा कर पंक्ति में बैठ गया। दूसरे ने गिना तो उसकी गिनती भी ग्यारह पर ही अटक गई। इस तरह सभी ने गिनती कर ली, लेकिन गिनती में आए ग्यारह ही। फिर क्या था, सभी लगे रोने कि उनका एक साथी नदी में बह गया।
     तभी वहाँ ले गुज़र रहे एक यात्री ने उनसे रोने का कारण पूछा। इस पर उन्होने कारण बताया। यात्री समझ गया कि सभी ने अपने आपको छोड़कर बाकी को गिन लिया होगा। वह बोला-यदि मैं तुम्हारे बारहवें साथी को वापस ला दूँ तो तुम मुझे क्या दोगे? वे सब बोले- हम तुम्हें देवता मान लेंगे। इसके बाद उसने सभी को बैठाकर कहा कि मैं सभी के मुँह पर एक-एक चाँटा लगाऊँगा। सब बढ़ते क्रम में गिनती बोलना। सभी राजी हो गए और उसने चपत लगाना शूरु कर दिया और बारह के बारह गिन डाले। सभी उस यात्री को चमत्कारी मानकर उसके पैरों में गिर पड़े।
     दोस्तो, यही होता है खुद को न गिनने का परिणाम। जो खुद को नहीं गिनता उसे रोना ही पड़ता है। क्योंकि जब आप खुद को गिनेंगे नहीं, तो अपने आपमें सुधार कैसे कर पाएँगे। फिर तो आप जैसे हैं, वैसे ही रह जाएँगे। आपकी कमियाँ, कमजोरियाँ सब आपके अंदर बनी रहेंगी। आपकी खूबियाँ शक्तियाँ उजागर नहीं हो पाएँगी। वे दबी ही रह जाएँगी। तब ऐसे में आपके आगे बढ़ने के, कामयाबी हासिल करने के ख्वाब सिर्फ ख्वाब ही रह जाएँगे। इसलिए यदि आप चाहते हैं कि आप भी गिनती में आएँ, तो आपको पहले खुद को गिनना पड़ेगा।
     दूसरी ओर, कुछ लोगों की आदत होती है कि उनका ध्यान हमेशा दूसरों में ही अटका रहता है कि दूसरे क्या गलत कर रहे हैं। वैसे ऐसा अकसर हम सभी के साथ होता है। हम चाहते हैं कि दूसरे खुद को सुधारें। वे जो करें, अच्छा करें। लेकिन हम खुद को सुधारना नहीं चाहते। इसका कारण यह है कि हमारा अपनी गलतियों की ओर ध्यान ही नहीं जाता और न ही हमें इससे मतलब होता है। यह गलत है। यदि आप सामने वाले को सुधारना चाहते हैं तो ज़रूरी है कि पहले खुद को सुधारें। क्योंकि अधिकतर होता यह है कि हम खुद गलत होने के बावजूद दूसरे को गलत समझते रहते हैं। यहाँ भी वही खुद को न गिनने वाली प्रवृत्ति ही काम करती है।
     वैसे खुद की गिनती न करने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण यह भी होता है कि हम गलतफहमी में, रहते-जीते हैं कि हम खुद को अच्छी तरह जानते हैं। हमारे अन्दर यह भाव काम करता है कि खुद को भी कोई भूलता है भला। कहते हैं याद उन्हे किया जाता है जिन्हें भूल जाते हैं। हम खुद को यही सोचकर याद नही करते। जबकि हम दुनियाँदारी में फँसकर वाकई में स्वयं से अपरिचित से हो गए हैं। हमे बाकी सब तो याद रहता है, लेकिन हमारी याददास्त अपने बारे कम हो गई है। अधिकतर असफल लोग इसी कारण गिनती से बाहर हो गए हैं। साथ ही छोटी मोटी कामयाबी हासिल करने वाले सिर्फ यह सोचकर चुप बैठ गए कि अब तो वे गिनती में आ गए हैं। अब उन्हें कुछ करने की क्या जरूरत। और इस तरह वे किसी बड़े मुकाम तक नहीं पहुँच पाए।
     यानी कुल मिलाकर गिनती में आने के लिए पहले खुद को गिनो यानी खुद को पहचानो। अपनी कमजोरियों पर काबू पाओ, खूबियों को तराशो और फिर गिन-गिन कर कदम आगे बढाओ। यदि आप ऐसा करेंगे तो सभी की गिनती आपसे ही शुरू होगी।