Wednesday, August 17, 2016

मौन से जानो तुम हो कौन


     एक बार एक मछलीमार अपना काँटा डाले तालाब के किनारे बैठा था। काफी समय बाद भी कोई मछली उसके काँटे में नहीं फँसी थी। उसने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मैने काँटा गलत जगह डाला हो और यहाँ कोई मछली ही न हो। उसने तालाब में झाँका तो देखा कि उसके काँटे के आसपास बहुत-सी मछलियाँ थीं। उसे बहुत आश्चर्य हुआ कि इतनी सारी मछलियाँ होने के बाद भी कोई मछली फँसी क्यों नहीं जबकि काँटे में दाना भी लगा है। क्या कारण हो सकता है?
     वह ऐसा सोच ही रहा था कि एक राहगीर ने उससे कहा-लगता है भैया यहाँ पर मछली मारने बहुत दिनों बाद आए हो। इस तालाब की मछलियाँ अब काँटे में नहीं फँसती। इस पर उसने हैरत से पूछा- क्यों, ऐसा क्या हुआ है यहाँ? राहगीर बोला- पिछले दिनों तालाब के किनारे एक बहुत बड़े संत आकर ठहरे थे। उन्होने यहां "मौन की महत्ता' पर प्रवचन दिए थे। उनकी वाणी में इतना तेज़ था कि जब वे प्रवचन देते तो सारी मछलियाँ बड़े ध्यान से सुनतीं। यह उनके प्रवचनों का ही असर है कि उसके बाद जब भी कोई इन्हें फँसाने के लिए काँटा डालकर बैठता है तो ये "मौन' धारण कर लेती हैं। जब मछली मुँह खोलेगी ही नहीं तो काँटे में फँसेगी कैसे? इसलिए बेहतर यहीं है कि आप कहीं और जाकर काँटा डालो। उसकी बात मछलीमार की समझ में आ गई और वह वहां से चला गया।
     कितनी सही बात है यह, जब मुँह खोलोगे ही नहीं तो फँसोगे कैसे? यह बात मछलियों की तरह उन व्यक्तियों को भी समझ लेनी चाहिए जो अपनी बकबक करने की आदत के चलते स्थान और समय का ध्यान रखे बिना अपना मुँह खोलकर मुसीबत में फँस जाते हैं। गलाकाट प्रतियोगिता के इस युग में इस बात का महत्व उस समय और बढ़ जाता है जब न जाने कौन अपना काँटा डाले आपको फँसाने के चक्कर में हो। जैसे ही आपने मुँह खोला, आप फँसे।
     ऐसी स्थितियों से बचने के लिए ज़रूरी है कि हम मौन का अभ्यास करें। धीरे-धीरे अभ्यास से हम सीख जाएंगे कि कहां बोला जाए, कहाँ नहीं। इसके अभ्यास से ही कई बार कम योग्य लोग अपने से अधिक योग्य लोगों की तुलना में उच्च पदों पर होते हैं और योग्य व्यक्ति अपनी सारी शक्ति उनकी आलोचना करने में ही खर्च करते रहते हैं। यानी कह सकते हैं कि योग्य और सफल बनना है तो "मौन' की साधना करो। और इस साधना की शुरुआत के लिए आज से बेहतर दिन क्या होगा। हमें कभी कभी मौन भी रहना चाहिए। हम आपस में कटु की जगह मीठे वचन बोलें। अब यह तो मानी हुई बात है कि किसी की बुराई करना हो तो कोई भी व्यक्ति घंटों बोल सकता है लेकिन प्रशंसा के लिए उसे अधिक शब्द ही नहीं मिलते और वह न चाहते हुए भी मौन हो जाता है।
     इसके साथ ही अमावस्या प्रतीक है विपत्तियों व मुसीबतों रूपी अँधकार का। यानी जब आप मुसीबतों से घिरे हों तो मौन रहने में ही भलाई, क्योंकि बोलने से ऊर्जा का क्षय होता है। ऐसे समय में मौन रहकर आप अपनी ऊर्जा की बैटरी को रीचार्ज कर सकते हैं और संचित ऊर्जा के ज़रिये मसीबतों का सामना आसानी से किया जा सकता है।
     ये तो हुई मौन से जुड़ी हुई बाहरी बातें। मौन का संबंध आपके भीतर से भी है। हम अकसर कहते हैं कि अपने गुण, अपनी क्षमता और प्रतिभा को पहचानो। अपने अंदर छुपी संभावानओं को जानो। यदि हम यह सब जानना-पहचानना चाहते हैं तो इस प्रक्रिया की पहली सीढ़ी है मौन। मौन रहकर ही हम जान सकते हैं हम कौन और क्या हैं।
     मौन रहकर ही हम अपनी सोच का दायरा बढ़ा सकते हैं। यही आपको पहुँचाता है आपके भीतर के कल्पवृक्ष तक जहां बैठकर आप अपनी मनोकामनाओं को पूरा कर सकते हैं। इसीलिए कुछ लोग मौन को रहस्यमयी कहते हैं। उनका मानना है कि यह अपने अंदर बहुत से रहस्य छुपाए रहता है। हालाँकि हमारा मानना है कि यह रहस्य छुपाता नहीं बल्कि उजागर करता है आपके अपने अंदर छुपे रहस्यों को। कौन है जो इन्हें जानना नहीं चाहेगा। तो जानो। कैसे? मौन रहकर। क्या? पूछते हो कि मौन कैसे रखें? इसमें क्या दिक्कत है बस हो जाओ मौन। मौन होने की कोई विशेष विधि थोड़े ही है। मौन होकर देखो-सुनो अपने आसपास की घटनाओं को, लेकिन कोई प्रतिक्रिया न हो। यदि एकांत में बैठे हों तो ज्यादा श्रेष्ठ स्थिति है। इस तरह अभ्यास करो "मौन' का। पहले कम समय करो, धीरे-धीरे बढ़ाते जाओ। कुछ समय बाद आपको अपने सभी प्रश्नों के उत्तर मिलने लगेंगे।
     इस तरह "मौन' पर बोलने के लिए बहुत कुछ है। यह गंभीर विषय है और सभी तालों की चाबी भी। अब इस चाबी से आप अपने मन के कितने दरवाज़े खोलते हैं, यह आप पर निर्भर है। फिलहाल तो हम आपसे यहीं आग्रह कर सकते हैं कि ज्यादा न हो सके तो कम से कम आज के दिन कुछ समय के लिए मौन धारण कर इसकी महत्ता को जानें।

Friday, August 12, 2016

क्षमता के अनुरूप ही हो लक्ष्य


     एक बार एक शेरनी ने दो बच्चों को जन्म दिया। वह बच्चों की देखभाल करती और शेर जंगल में जाकर शिकार करके लाता। एक दिन बहुत कोशिशों के बाद भी उसे कोई शिकार नहीं मिला। जब वह गुफा की ओर लौट रहा था तो उसकी नज़र सियार के एक नवजात बच्चे पर पड़ी। उसने सोचा चलो आज इसी से काम चलाएँगे। ऐसा सोचकर उसने अपना पंजा सियार के बच्चे की ओर बढ़ाया लेकिन उसकी मासूमियत पर उसे दया आ गई। वह सोचने लगा कि इसे मैं तो मार नहीं सकता। मैं इसे घर ले जाता हूँ और इसके बाद शेरनी की जो इच्छा हो, वो कर लेगी। ऐसा विचार कर वह बच्चे को सावधानी पूर्वक अपने मुँह में दबाकर गुफा में ले गया। शेरनी ने जब पूछा कि आज क्या लाए हो तो शेर बोला-आज मुझे कोई शिकार तो नहीं मिला, लेकिन यह बच्चा मिला है। मेरी तो इसे मारने की हिम्मत नहीं हुई, लेकिन यदि तुम चाहो तो तुम इसे मारकर खा सकती हो। शेरनी बोली- जब तुम्हारी हिम्मत नहीं हुई तो मेरी कैसे होगी? आखिर मैं भी एक माँ हूं। मैं इसे पालूंगी। आज से मेरे दो नहीं, तीन बच्चे हैं।
     इसके बाद तीनों बच्चे साथ-साथ बड़े होने लगे। एक दिन जब वे अपनी माँद के बाहर धमाचौकड़ी मचा रहे थे कि एक हाथी उधर से गुज़रा। उसे देखकर एक शेर शावक बोला- यह कौन-सा जानवर है? इसकी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की? चलो भाइयों, उसे सबक सिखाएँ। ऐसा कहकर जैसे ही वे आगे बढ़े तो सियार का बच्चा बोला-ठहरो! वह कितना बड़ा है। हम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। बेहतर यही है कि हम माँद में चलकर अपनी जान बचाएँ। शेर शावक उसकी बात सुनकर हँसने लगे। लेकिन वह इसे नज़र अंदाज़ कर दुम दबाकर माँद में भाग गया। उसके पीछे-पीछे उसके भाई भी आ गए, लेकिन निडरतापूर्वक आराम से चलते हुए। उन्होने आकर शेरनी को बताया कि किस तरह उनका कायर भाई खुद तो डर ही रहा था, उनसे भी जान बचाकर भागने को कह रहा था।
     माँ के सामने इस तरह मजाक बनता देख सियार के बच्चे को गुस्सा आ गया। वह अपने भाइयों को चुनौती देता हुआ बोला-मूर्खों! मैने बेकार ही तुम्हारी मदद की। मैं भी शेरनी का बच्चा हूँ, फिर कायर कैसे हुआ? मैं अभी मज़ा चखाता हूँ तुम्हें। उसे इस प्रकार नाराज़ देखकर शेरनी बोली- शांत हो जा मेरे बच्चे। चल, बाहर चलते हैं। मुझे तुझ से अकेले में कुछ बात करनी है। बाहर आकर शेरनी ने उसे समझाते हुए कहा-तुझे अपने बड़े भाइयों से इस तरह से बात नहीं करनी चाहिए। माँ को भाईयों की तरफदारी करता देख वह चिढ़ते हुए बोला-मेरी क्या गलती है माँ। एक तो मैने चतुराई दिखाई। क्या वो इतने विशाल जावनर का सामना कर सकते थे? गलती मानने की जगह उल्टे मेरा मज़ाक बना रहे हैं। समझते क्या हैं वे अपने आपको। देखना माँ, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा तो उन्हें ऐसे ही जावनर का शिकार करके दिखाऊँगा।
     उसकी बात सुनकर शेरनी सोचने लगी- मेरे लिए तीनों बच्चे बराबर हैं, लेकिन हैं तो यह सियार का ही बच्चा। हालांकि यह चतुर है, लेकिन इसमें उतनी ताकत कहाँ, जितनी मेरे बच्चों में है। अच्छा यही है कि मैं इसे इसकी असलियत के बारे में बता दूँ, वरना ऐसा न हो कि कहीं देर हो जाए। और शेरनी ने उसे सारी बात बता दी। अपने बारे में जानकर वह समझ गया कि माँ उसे क्यों समझा रही थी। उसे अपने डरपोक होने का कारण भी समझ में आ गया। और उसके बाद वह  बिना समय गँवाए वहां से अपने साथियों की खोज में निकल गया। वह सियार का बच्चा था, जिसमें कायरता के साथ चतुराई का गुण भी जन्मजात था। उसे समझ में आ गया कि यहाँ से निकल जाने में ही भलाई है। वह यह भी जान गया था कि वह चाहकर भी शेर के बच्चों की बराबरी नहीं कर सकता।
     मंत्र यह है कि सबकी अपनी-अपनी क्षमताएँ होती हैं। इसलिए पहले अपनी और अपनों की क्षमताओं को पहचानो। यदि वे बड़े लक्ष्यों के लिए हैं तो अपने लक्ष्य बड़े बनाओ। यदि वे कम हैं तो परेशान होने की आवश्यक्ता नहीं क्योंेंकि हम जानवर नहीं, मनुष्य हैं। और एक मनुष्य अपने पुरुषार्थ से अपनी क्षमताएँ बढ़ा सकता है। इन्हें बढ़ाने का सामान्य-सा मंत्र है कि हम वे काम करें, जिन्हें करने से डरते हैं। इस तरह जैसे-जैसे आप डर को जीतते जाएँगे, आपकी क्षमताएँ बढ़ती जाएँगी और फिर हम बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी सफल होते जाएँगे।

Tuesday, August 9, 2016

सोएँ तो घोड़े बेचकर


     किसी नगर में एक उद्योगपति रहता था। वह अथाह संपत्ति का मालिक था। न जाने कितनी फैक्टरियाँ थीं उसकी जिनमें हज़ारों लोग काम करते थे। वह इतना महत्वपूर्ण था कि आर्थिक नीतियों को तय करने से पहले उसके विचार लिए जाते थे। मीडिया की निगाहें हमेंशा उस पर लगी रहती थी। उसका निवास स्थान भी बड़ा आलीशान था। संसार का कौन-सा ऐसा सुख था, जो वह अपनी संपत्ति के बल पर प्राप्त नहीं कर सकता था और कौन-सी ऐसी वस्तु थी, जिसे वह खरीद नहीं सकता था। उसके बंगले में नौकरों-चाकरों की फौज थी, लेकिन इन सबके होते हुए भी दुःखी था क्योंकि उसे नींद न आने की बीमारी थी। देश-विदेश के बड़े-बड़े डाक्टरों से वह इलाज करा चुका था, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। नींद को न आना था, न वह आई। वह बहुत परेशान हो गया था। उसे अपनी सारी संपत्ति व्यर्थ प्रतीत होती थी। और सही भी है कि जब चैन से सोने को न मिले तो तिजोरियों में भरे सोने का क्या लाभ?
     उद्योगपति की पत्नी भी उसकी इस हालत के कारण काफी परेशान रहती थी। एक दिन उसके नगर में बहुत बड़े योगी पधारे। पत्नी ने उसे उस योगी से मिलने की सलाह दी। पत्नी कि सलाह पर वह बेमन से उनसे मिलने गया। वहाँ उसने योगी को अपनी परेशानी बताई। उसकी बात सुनकर योगी ने कहा कि पहले तुम मुझे अपनी दिनचर्या के बारे में बताओ। उसने अपनी पूरी दिनचर्या योगी को बता दी और बोला-अब आप ही बताएँ कि मेरे रोग का इलाज क्या है? मैं क्या करूँ?
     उसका प्रश्न सुनकर योगी बोले-महाशय! आपके रोग का कारण आपका अपाहिज होना है। योगी की बात सुनकर वह आश्चर्य से बोला- ये क्या कह रहे हैं आप! मैं और अपाहिज! मेरे तो सारे अंग-प्रत्यंग सही सलामत हैं। उसकी बात सुनकर योगी बोले- हाँ! लेकिन क्या तुम इनको ठीक तरह से उपयोग में लाते हो? तुमने अभी अपनी दिनचर्या बताई। इनमें कितनी जगह तुम अपने हाथ-पैर का सही इस्तेमाल करते हो। हर काम के लिए तुम दूसरों पर निर्भर हो। घर में नौकर-चाकरों और दफ्तर में सहायकों पर। और रही-सही कसर तुम्हारी पत्नी पूरी कर देती है। जब हाथ-पैर होते हुए भी तुम उनका उपयोग नहीं करते हो तो फिर अपाहिज ही हुए ना? ज़रा कष्ट दो अपने शरीर को। व्यायाम करो, कुछ और काम करो, इतना करो कि तुम्हारा शरीर थकान से चूर हो जाए। फिर देखो, नींद कैसे नहीं आती। वैसे भी यदि यही हाल रहा तो हो सकता है कि कुछ समय बाद तुम्हें और भी बीमारियाँ घेर लें। इसलिए बेहतर है कि अभी से सतर्क हो जाओ। योगी अंत में बोले- तो फिर आज जाकर अपने काम खुद करने की कोशिश करो, उसके बाद परिणाम देखो।
     योगी की बात ध्यानपूर्वक सुनने के बाद उद्योगपति उन्हें प्रणाम कर लौट आया और उसने न चाहते हुए भी योगी की बात को आजमाने के लिए उस पर अमल किया। शाम को वह थक-हार कर घर लौटा और डिनर करने के बाद तुरंत अपने बैडरूम में चला गया। उसकी पत्नी को यह बात कुछ अजीब लगी। थोड़ी देर बाद जब वह पति का हाल जानने के लिए बेडरूम में गई तो उसने देखा कि उसके पति खर्राटे ले रहे हैं। पति को इस अवस्था में देख उसने चैन की साँस ली।
     यह केवल उस उद्योगपति की कहानी नहीं है, आज सफलता पाने की तमन्ना में भागते-दौड़ते हर उस व्यक्ति की कहानी है जो सब कुछ पा लेने के चक्र में अपनी नींद की कुर्बानी देता रहता है। यहाँ समस्या हाथ-पैर न चलाने की नहीं, बल्कि जल्दबाज़ी की है। उसे सारी खुशियाँ चुटकी बजाते ही चाहिए और जब ऐसा नहीं होता तो तनाव के कारण उसकी नींद उड़ जाती है। ऐसे लोगों की संख्या महानगरों में अधिक है जहाँ नींद न आने की बीमारी आम बात है। लेकिन अब यह समस्या धीरे-धीरे छोटे शहरों को भी अपनी गिरफ्त में लेने लगी है। ये वे लोग हैं जो सोचते हैं कि दिन केवल चौबीस घंटे का ही क्यों होता है? अधिक घंटों का होता तो लक्ष्य जल्दी पा जाते।
     लेकिन यकीन मानिए, ऐसा होना संभव नहीं है। आप खुद ही सोचिए, जब आप किसी कार्य में व्यस्त होने के कराण एक-दो दिन ठीक से सो नहीं पाते तो तीसरे दिन आपको काम करते-करते नींद आने लगती है। इसका असर होता है आपके कार्य पर और परिणाम यह होता है कि आपकी कार्यकुशलता प्रभावित होती है। यदि अधिक समय तक ऐसा चलता है तो आप जाने-अनजाने सफलता के नहीं, असफलता के पीछे भाग रहे होते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि आप जिस किसी भी तरह के काम से जुड़े हों, उसे नियत समय में करें और चौबीस घंटे के दिन के चक्र में सात-आठ घंटे की नींद अवश्य लें। नींद न केवल आपको तरोताज़ा करती है, बल्कि काम करने की नई स्फूर्ति भी देती है। एक बात और, सोते वक्त सब कुछ भूलकर ऐसे सोएँ जैसे कि घोड़ा बेचकर आए हों। हाँ, दूसरी ओर यह भी सही है कि नियत अवधि से ज्यादा न सोएँ क्योंकि ज्यादा सोना भी वैसे ही दुष्परिणाम देता है, जैसे कम सोने के होते हैं।

Friday, August 5, 2016

क्रोध की प्रतिक्रिया क्रोध नहीं


     महाभारत की एक शिक्षाप्रद कथा है। भीष्म ने कौरवों और पांडवों के शिक्षण का दायित्व द्रोणाचार्य को सौंपा था। द्रोणाचार्य की अपनी शिक्षण पद्धति थी और वे किसी शिष्य का पीछा तब तक नहीं छोड़ते थे, जब तक कि शिष्य उनके द्वारा दिए गए पाठ को ठीक से याद न कर ले। एक बार उन्होने अपने सभी शिष्यों को बुलाकर कहा कि आज का पाठ है "क्रोध न कर' आप सभी इस पाठ को याद कर कल मुझे सुनाएँगे। अगले दिन सभी शिष्य जब कक्षा में आए तो द्रोणाचार्य ने सभी से पाठ दोहराने को कहा। युधिष्ठिर को छोड़कर सभी ने पाठ दोहरा दिया।
     गुरु जी ने पूछा-पुत्र! क्या बात है? तू तो इन सबसे बड़ा है, फिर भी तुझे इतना छोटा-सा पाठ याद नहीं हुआ। जा, कल याद करके जरूर सुनाना। युधिष्ठिर ने कहा- जी गुरुदेव! मैं अवश्य प्रयत्न करूँगा। अगला दिन आया और फिर वहीं कहानी दोहराई गई। युधिष्ठिर ने कहा कि उसे पाठ याद नहीं हुआ। गुरु जी ने फिर से अगले दिन याद करके आने को कहा। इस तरह कई दिन व्यतीत हो गए। द्रोणाचार्य हैरान थे कि उनका एक योग्य शिष्य, इसे साक्षात धर्मराज का अवतार माना गया है, इतना छोटा-सा पाठ याद नहीं  कर पा रहा है। बाकी शिष्य आगे के कई पाठ याद कर चुके थे। जब कई दिन व्यतीत हो गए तो एक दिन द्रोणाचार्य ने निर्णय किया कि आज तो मैं इसे पाठ याद करवाकर ही रहूँगा। जब कक्षा प्रारंभ हुई तो उन्होने यधिष्ठिर से प्रतिदिन की तरह पाठ सुनाने को कहा।
     युधिष्ठिर ने कहा-गुरुदेव! बहुत प्रयत्नों के बाद भी मुझे पाठ पूरी तरह याद नहीं हुआ। इसलिए मैं इसे आपको सुनाने में असमर्थ हूँ। गुरुदेव तो पहले ही ठान कर बैठे थे कि आज तो वे किसी भी स्थिति में उसे पाठ याद कराएँगे। युधिष्ठिर का उत्तर सुनकर उन्हें क्रोध आ गया और उन्होने युधिष्ठिर की पिटाई शुरु कर दी। इतना सा पाठ याद नहीं होता तुझे। निरामूर्ख है। ऐसा कहते कहते वे युधिष्ठिर की पिटाई करते जा रहे थे। लेकिन युधिष्ठिर था कि खड़ा-खड़ा मुस्करा रहा था, जैसे उस पर पिटाई का कोई प्रभाव ही नहीं पड़ रहा हो, उसको मुस्कराते देख गुरुदेव का क्रोध और भी बढ़ता जा रहा था और वे और अधिक शक्ति से उसे पीटने लगे। इस प्रकार पीटते-पीटते जब वे थक गए और उन्होने पीटना बंद कर दिया, तब भी युधिष्ठिर मुस्करा ही रहा था। आचार्य से रहा नहीं गया। उन्होने आश्चर्य से पूछा- मैं तुझे पीट रहा हूँ और तू मुस्करा रहा है?
     गुरुजी की बात सुनकर युधिष्ठिर ने गुरुदेव के थके हाथों को दबाते हुए कहा- जी गुरुदेव! आप ही ने तो सिखाया है "क्रोध न कर।' युधिष्ठिर आगे बोला-इतने दिनों से मैं अनुभव कर रहा था कि जब भी कौरव मेरा उपहास करते हैं, मुझे क्रोध आ जाता है और मैं उस पर नियंत्रण नहीं रख पाता। लेकिन आज मैने पाया कि जब आप मेरी पिटाई कर रहे थे, उस दैरान कौरवों की उपहासपूर्ण भावभंगिमाएँ देखकर भी मुझे क्रोध नहीं आया। अब मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं कि मुझे यह पाठ याद हो गया है। युधिष्ठिर की बात सुनकर गुरुदेव को अपने किए पर पछतावा होने लगा और वे स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले-पुत्र! सही कहा तुमने। तुम्हें तो यह पाठ याद हो गया, लेकिन तुम्हें सिखाते-सिखाते मैं स्वयं भूल गया था। आज मैने अपने शिष्य से इस पाठ को पुनः सच्चे अर्थों में सीख लिया।
     यही है आज का मंत्र "क्रोध न कर।' लेकिन यह मंत्र तभी फलीभूत होगा, जब आप इसे न सिर्फ याद करें बल्कि व्यवहार में भी लाएँ। यहाँ सीखने वाली एक और बात है कि जब एक व्यक्ति क्रोध कर रहा हो तो हमें प्रत्युत्तर में कभी क्रोध नहीं करना चाहिए, क्योंकि क्रोध को अग्नि समान माना गया है और आग को बुझाने के लिए कभी आग का प्रयोग नहीं किया जाता। इसलिए ऐसी स्थिति में एक व्यक्ति को संयम से काम लेना चाहिए, क्योंकि जो क्रोध कर रहा है, उसे बाद में पछतावा अवश्य होगा। कहा भी गया है कि क्रोध मूर्खता से शुरु होता है और पश्चाताप पर खत्म। गुरु द्रोणाचार्य को भी बाद में इसी तरह पश्चाताप हुआ।
     कहते हैं कि क्रोध कुछ पल का पागलपन होता है। इस पर काबू पाने का सबसे आसान उपाय यह है कि जब भी आपको क्रोध आए तो दस तक गिनती गिनें और यदि अधिक क्रोध आए तो हज़ार तक गिने। यह नई बात नहीं है, हम सभी ने अनेक बार सुनी-पढ़ी है, लेकिन क्रोध आने पर हम इस पर अमल नहीं करते और इसी कारण क्रोध के परिणाम भुगतने पड़ते हैं। ये तो हुई कुछ सामान्य सी बातें क्रोध के बारे में। लेकिन केवल इतनी-सी बातों से काम नहीं चलेगा। यह इतना गंभीर विषय है कि इस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। इसलिए हम आगे भी इस विषय को तब तक दोहराते रहेंगे जब तक कि आप थक-हारकर क्रोध करना न छोड़ दें। आज के लिए सिर्फ इतना ही कि "क्रोध की प्रतिक्रिया क्रोध नहीं हो सकता।' इसलिए भविष्य में जब भी आप पर कोई क्रोध करे तो आप इस मंत्र को याद करते हुए बिना प्रतिक्रिया व्यक्त किए शांत भाव से सुनते रहें। अंतिम परिणाम वही होंगे जो यधिष्ठिर के साथ हुए।

Monday, August 1, 2016

बोलें ऐसा जो समझ में आए


     बृहदारण्यक उपनिषद के पंचम अध्याय की एक कथा है। एक बार देवता, मनुष्य और असुर मिलकर प्रजापति के पास पहुँचे। उन्होने अपने कल्याण के लिए प्रजापति से उपदेश देने का आग्रह किया। उनके आग्रह को प्रजापति ने स्वीकार कर लिया, लेकिन उन्होने सभी से पहले ब्राहृचर्य व्रत का पालन करने को कहा। निश्चित अवधि तक इस व्रत का पालन पूरी लगन और तपस्या से करने के बाद वे प्रजापति के पास पहुँचे। उन्हें देखकर प्रजापति ने कहा कि अब तुम सभी मेरे उपदेशों सो सुनने के योग्य हो गए हो। उसके बाद उन्होने सबसे पहले देवताओं को बुलाया। जब देवता उनके पास आ गए तो प्रजापति ने तेज़ स्वर में उनसे "द' अक्षर कहा और मौन हो गए। सभी देवता "द' का अर्थ सोचने लगे। कुछ क्षण बाद उन्होने देवताओ से पूछा कि क्या आप समझ गए कि "द' से मेरा आशय क्या है? देवता बोले- जी प्रजापति! "द' अर्थात दमन करो।' आपने हमें अपनी इंद्रियों का दमन करने का आदेश दिया  है। प्रजापति बोले- बिल्कुल ठीक। तुमने इसका सही अर्थ समझा है। तुम्हें यही करना चाहिए, इससे तुम्हारा कल्याण  होगा। इसके बाद मनुष्य आगे आए। प्रजापति उन्हें भी "द' अक्षर कहकर मौन हो गए। अब सभी मनुष्य उस पर विचार करने लगे। प्रजापति ने कुछ समय बाद उनसे पूछा-तुम समझे या नहीं कि "द' से मेरा आशय क्या है? मनुष्य बोले- जी प्रजापति! आप हमें "दान' करने का आदेश दे रहे हैं। प्रजापति ने मनुष्यों से कहा- तुम भी ठीक समझे। जाओ और खूब दान करो। इससे तुम्हारा कल्याण होगा। अंत में असुर आगे आए। प्रजापति ने उनसे पूछा- क्या तुम मेरा उपदेश सुनने के लिए तैयार हो? असुर बोले- जी हाँ, प्रजापति! हम तैयार हैं। प्रजापति बोले- तो सुनो! उसके बाद प्रजापति ने उनसे भी "द' अक्षर कहा, और एक बार वे फिर से मौन हो गए। असुर भी "द' अक्षर के पीछे छिपे आदेश के बारे में विचार करने लगे। कुछ समय बाद प्रजापति ने उनसे पूछा-असुरों! तुम क्या समझे "द' अक्षर से मेरा आशय? असुर बोले-प्रजापति! आपने हमें 'दया' करने का आदेश दिया है। आपने कहा है कि हम सभी पर दया करें। प्रजापति बोले-तुम भी ठीक समझे। तुम्हारे लिए "द' से मेरा यही आशय था। जाओ और सभी पर दया करो। इसमें ही तुम्हारा कल्याण निहित है। उसके बाद सभी प्रजापति का अभिवादन कर वहाँ से चले गए।
     इस कथा की पृष्ठभूमि कुछ इस तरह थी कि उपनिषद काल में एक समय ऐसा आया कि सभी देवता विलासी हो गए। वे अपनी इंद्रियों के वशीभूत होकर अपने कर्तव्यों को भूल गए थे। सिर्फ भोगों में लिप्त होकर विलासितापूर्ण जीवन जीना ही उनका उद्देश्य बन गया था। उनकी यह प्रवृत्ति कम होने की जगह दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थी। मनुष्यों का आचरण भी संग्रह प्रधान हो गया था। वे सभी वस्तुओं व धन संपत्ति के संग्रह में लगे थे। दान-दक्षिणा से तो जैसे उनका कोई लेना-देना ही नहीं रह गया था। जिससे समाज में आर्थिक विषमता बढ़ती जा रही थी। दूसरी ओर असुरों ने चारों ओर हिंसा और अत्याचार का वातावरण निर्मित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी। उन्हें किसी पर भी दया नहीं आती थी। वे केवल मारकाट में ही विश्वास रखते थे। प्रजापति ने उन सभी की मनोवृत्तियों को ध्यान में रखते हुए ही एक ही अक्षर "द' के माध्मय से उपदेश दे दिया और तीनों ने अपने आचरणों और कर्मों के अनुसार उसका आशय अपने-अपने लिए सही अर्थो में ग्रहण किया। इसे कहते हैं "संचार योग्यता' यानि "कम्युनिकेशन स्किल।'
     यह कथा कई तरह से सीख देने वाली है, लेकिन सबसे प्रमुख सीख जो इससे मिलती है, वह यही कि यदि आप में योग्यता है तो आप कितने संक्षेप में अपनी बात सामने वाले को समझा सकते हैं। यहाँ तक कि केवल एक शब्द से ही दूसरे व्यक्ति को अपनी बात समझाई जा सकती है। कह सकते हैं कि संचार में शब्द महत्वपूर्ण नहीं होते। ज्यादा महत्वपूर्ण यह बात है कि आप क्या कह रहे हैं और किससे कह रहे हैं। संचार की पूर्णता इस बात में है कि वक्ता द्वारा कही गई बात श्रोता द्वारा उन्हीं संदर्भों में ग्रहण कर ली जाए जिन संदर्भों में वक्ता ने कही है, यानी वक्ता के कहने का आशय श्रोता को सही-सही समझ में आ जाए। केवल भारी-भरकम  शब्दों का प्रयोग कर अपनी भाषायी योग्यता का प्रदर्शन करने से ही संचार पूरा नहीं होता। यदि आप जो कह-लिख रहे हैं, वह सामने वाले की समझ में ही नहीं आ रहा तो ऐसी बातों का क्या मतलब? आप पांडित्य झाड़ते रहें और सामने वाला उसे ग्रहण ही न कर पाए। इसलिए जब आप कोई भी बात सामने वाले की मनोस्थिति और स्तर देखते हुए कहेंगे, तो वह आसानी से उसकी समझ में आ जाएगी। संचार क्रांति के इस दौर में जबकि किसी भी व्यक्ति या व्यवसाय की सफलता में संचार का योगदान महत्वपूर्ण हो गया है, ऐसे में इस बात को ध्यान में रखना और भी ज़रूरी हो जाता है। आज के समय में जबकि आपको अपने कार्य के सिलसिले में विस्तृत दायरे में संचार करना पड़ता है। यानी देश-विदेश में रहने वाले विभिन्न संस्कृति वाले लोगों से कई स्तरों पर वार्तालाप करना होता है तो ऐसी स्थिति में सफलता दिलाने में संचार योग्यता की निर्णायक भूमिका होती है। इसलिए "भाषायी योग्यता' से ज्यादा ज़रूरी है संचार योग्यता।' और इसके साथ साथ मनुष्य को दान करते रहना चाहिए।
पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम।।
दोनों हाथ उलीचिए यही सयानों काम।

Friday, July 29, 2016

आलस्य को छोड़ो, किस्मत को मोड़ो


     एक बार दो आलसी मित्र एक आम के पेड़ के नीचे लेटे हुए थे। इस तरह से लेटे हुए उन्हें बहुत समय बीत चुका था। इस कारण उन्हें भूख भी लगने लगी थी, लेकिन आलसी व्यक्ति भूख के आगे हार मान जाए तो फिर वह आलसी कैसा? वे भी अपनी जगह से नहीं हिले और उन्हें पेड़ के नीचे पड़े हुए सुबह से रात हो गई। जब भूख ज्यादा बढ़ गई तो एक आलसी ने अपना मुँह खोल लिया। उसे ऐसा करते देख दूसरा आलसी अपनी जगह से बिना हिले बोला-ये, क्या कर रहा है तू?
     इस पर पहला आलसी बोला-देख न यार, यह आम का पेड़ कितना निर्दयी है। मैं भूख के मारे कब से मुँह खोले पड़ा हूँ, लेकिन इसे मेरी हालत पर ज़रा भी दया नहीं आती। इसके पास कितने सारे आम हैं, एकाध मेरे मुँह में टपका भी देगा तो इसका क्या घट जाएगा। उसका इतना कहना था कि आम के पेड़ से एक आम टपककर उसकी छाती पर आ गिरा। जैसे आम के पेड़ ने उसकी पुकार सुन ली हो, लेकिन यहां नई मुसीबत। आम टपका भी तो छाती पर। एक बार मुँह में टपकता तो उसे चबाने की तकलीफ वह कर भी सकता था। अब क्या करे? वह सोचने लगा- मेरा आलसी दोस्त तो उठकर खिलाने से रहा, काश! कोई राहगीर यहां से गुज़रे और मुझे आम खिलाए। इस तरह सोचते हुए रात से सुबह हो गई।
     सुबह वहां से जागिंग करता हुआ एक आदमी गुज़रा। उसने देखा कि पेड़ के नीचे पड़े हुए दो व्यक्तियों को एक कुत्ता सूँघ रहा है। उसने सोचा कि शायद दोनों रात में ठंड से ठिठुरकर मर गए हैं, जाकर थाने में खबर करता हूँ। वह ऐसा सोच ही रहा था कि उसकी दृष्टि आलसियों की आँखों पर पड़ी। उनकी आँखें खुली हुई थीं और पलकें झपक रही थीं। आदमी ने सोचा नज़दीक-जाकर देखता हूँ, माज़रा क्या है? ऐसा विचार कर पहले तो उसने कुत्ते को भगाया और फिर आलसियों के नज़दीक पहुँचकर उसने पूछा-क्यों! जिंदा हो या मर गए? उसकी बात सुनकर पहला आलसी बोला- शुभ-शुभ बोलो भैया! मरें हमारे दुश्मन। हम तो अच्छे-भले हैं और आप जैसे ही किसी भले आदमी का इंतज़ार कर रहे हैं कि वह आकर हमें आम खिलाए जिससे कि कल से भूखे पेट में कुछ तो जाए। उसकी बात सुनकर आदमी को यह समझते देर नही लगी कि उसका पाला आज आसलियों से पड़ा है।
     वह बोला- तुम दोनों आलसी हो क्या? मैं क्यों खिलाऊँ, यह आम तुम्हें खुद खाना चाहिए। इसके पहले कि वह जवाब देता दूसरा आलसी बोला- इसके आलस की तो मत पूछो भैया, रात भर से कुत्ता मेरा मुँह चाट रहा था लेकिन इसकी हिम्मत नहीं हुई कि उठकर उसे भगा दे। तो उसे तुमने खुद क्यों नहीं भगाया? उस आदमी ने पूछा। दूसरा आलसी बोला- मैं कैसे भगाता भैया, मैं तो लेटा हुआ था ना। अच्छा, सही कहा तुमने, तुम तो लेटे हुए थे। ऐसा कहकर उस आदमी ने आलसी की छाती पर पड़े हुए आम को उठाकर घुमाना शुरु कर दिया। उसे ऐसा करते देख दोनों आलसियों ने आम खाने के लिए अपने मुँह खोल लिए, लेकिन आदमी ने आम उन्हें खिलाने की बजाए खुद ही खाना शुरु कर दिया और उन्हें ठेंगा दिखाता हुआ आगे बढ़ गया। उसे मालूम था कि दोनों आलसी उसके इस व्यवहार का भी प्रतिकार करने के लिए नहीं उठेंगे।
     सही सोचा था उसने और आलसियों के साथ किया भी सही। हाथ आए मौके को कोई आलसी ही गवां सकता है। दरअसल वह आम नहीं एक मौका ही तो था और एक बुद्धिमान व सच्चे व्यक्ति मिले हुए अवसर का भरपूर लाभ उठाता है। यही उसने किया भी और स्वादिष्ट आम का भरपूर मज़ा उठाया।
     दूसरी ओर आलसी उसका ठेंगा देखते रह गए। वैसे भी दोनों गलतफहमी में थे कि वे अच्छे-भले हैं। वे तो मनुष्य के सबसे बड़े दुश्मन यानी आलस्य को अपने शरीर में किराएदार बनाकर बैठे हुए हैं। यही वह दुश्मन है जो उन्हें अहसास ही नहीं होने देता कि वे जीवित होकर भी मृत समान ही हैं। इसलिए जब तक वे इससे पीछा नहीं छुड़ाएँगे तब तक ज़िन्दगी में कुछ नहीं कर पाएँगे। एक बात और है, कई लोग आलस्य का मतलब सोने-सुलाने से लेते हैं और सोचते हैं कि हम तो बहुत कम सोते हैं फिर आलसी कैसे हुए। ऐसे लोग भी गलती पर हैं, क्योंकि किसी भी प्रकार की सुस्ती भी आलस्य की श्रेणी में ही आती है। तेज़ी के इस युग में जबकि एक क्षण की सुस्ती भी हमारी किस्मत बिगाड़ सकती हो तो हमें हर वक्त सचेत रहना चाहिए। इसलिए यदि आप किस्मत को मोड़ना चाहते हो, तो आलस्य को छोड़ना होगा। वरना आज के प्रतियोगी युग में यह आम बात है कि किसी की छाती पर गिरे अवसर रूपी आम का मज़ा कोई दूसरा ही लूट रहा होता है। मुझे उम्मीद है आप ऐसा नहीं होने देंगे और अपना आम खुद ही खाएंगे।

Monday, July 25, 2016

जैसा सोचोगे , वैसा बनोगे


     एक बार देवर्षि नारद जी हमेशा की तरह घूमते-घूमते उज्जयिनी पहुँचे। वहाँ उनका एक मित्र रहता था। उन्होने सोचा के बहुत दिन हो गए हैं, क्यों न आज अपने मित्र से भेंट की जाए। जब वे मित्र के घर पहुँचे तो उसे पहचान ही नहीं पाए। जब पहचाने तो बोले-मित्र! यह क्या दशा बना रखी है? जब हम पिछली बार मिले थे, तब तुम हट्टे-कट्टे  नौजवान थे। और अब अपने शरीर को देखो, जैसे सूखकर काँटा हो गए हो। इसका कारण क्या है?
     इस तरह नारद ने उस पर प्रश्नों की बौछार कर दी। जब नारद के सभी प्रश्न खत्म हो गए तो वह बोला-मित्र! तुम सही कहते हो। लेकिन अब वे दिन लद गए जब मैं जवान था, कुँवारा था। अब मैं शादीशुदा हूँ, बाल-बच्चेदार हूँ। मेरी आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं रही। घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारी में आदमी की हालत ऐसी ही हो जाती है। परन्तु तुम मेरी बातों को कैसे समझोगे, तुम तो ब्राहृचारी हो। सांसारिक परेशानियों से तुम्हारा क्या लेना-देना। खैर, छोड़ो, और बताओ कैसे आना हुआ? उसकी बात का नारद ने कोई उत्तर नहीं दिय। वे मित्र की हालत देखकर व्यथित थे और उसकी सहायता करना चाहते थे। लेकिन उनके पास उसे देने के लिए कुछ नहीं था। अचानक उन्हें एक उपाय सूझा। वे बोले-ये सब चलता रहेगा। चलो हम स्वर्गलोक घूमकर आते हैं।
     इस पर वह बोला- लेकिन, मेरी पत्नी और बच्चे। नारद बोले-कुछ समय के लिए उन्हें भूल जाओ। थोड़ा समय अपने मित्र के साथ भी तो बिताओ। हम दोनों जल्दी ही लौट आएँगे। नारद की बात पर वह सहमत हो गया और दोनों स्वर्गलोक में पहुँचे। वहाँ एक अत्यंत खूबसूरत बाग था। नारद उसे एक वृक्ष के नीचे इंतज़ार करने को कहकर देवराज इंद्र के महल में चले गए। नारद जी के जाने के बाद वह वहाँ के सौंदर्य को निहारने लगा। जब बहुत देर हो गई और नारद जी नहीं लौटे तो वह बैठा-बैठा थक गया। अचानक उसके मन में एक विचार उठा-इतनी सुंदर जगह पर यदि बिस्तर भी होता तो लेटने में कितना आनंद आता। उसका विचार अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि उसने देखा कि वह एक आरामदायक बिस्तर पर लेटा हुआ है। अपने आपको बिस्तर पर पाकर वह आश्चर्यचकित हुआ लेकिन फिर उसने सोचा कि यह स्वर्ग है, शायद कोई चमत्कार हुआ होगा।
     कुछ समय बाद उसके मन में विचार आया कि काश! कोई आकर मेरे पैर दबा दे तो कितना आराम मिले। पलक झपकते ही वहाँ कई सुंदर अप्सराएँ आ गर्इं। कोई उसके हाथ दबाने लगी तो कोई पाँव। कुछ देर तो वह आनंद में रहा, लेकिन अचानक उसे विचार आया कि यदि मेरी पत्नी यह सब देख ले तो वह निश्चित ही मुझे पीटने लगे। फिर क्या था, उसकी बीबी सामने खड़ी थी हाथ में बेलन लिए। उसने उसके विचार के अनुसार पीटना भी शुरू कर दिया। वह बीबी से डरकर भागा तो सामने से नारद जी आ रहे थे। वे अंदर से छुपकर सब देख रहे थे। दरअसल वे जान बूझकर उसे कल्पवृक्ष के नीचे बैठाकर गए थे ताकि वह अपनी सभी मनोकामनाएं पूरी कर ले और वे उसे वापिस उसके घर छोड़ आएँ। नारद उससे बोले-बड़े ही मूर्ख हो तुम। सोचना ही था तो कुछ अच्छा सोचते जिससे तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का कल्याण होता। यहाँ सोचा भी तो बीबी से पिटने के बारे में। स्वर्ग में बैठकर भी तुम्हारी सोच नहीं बदली। मैं पहले ही कह रहा था कि कुछ समय के लिए अपनी परेशानियों को भूल जाओ। यदि भूल जाते तो शायद तुम्हें इस तरह भागना नहीं पड़ता।
     नारद के उस मित्र जैसी हालत उन सभी लोगों की होती है, जो अपने घर की परेशानियों को आफिस और आफिस की परेशानियों को घर ले जाते हैं। या फिर इसे इस तरह समझें कि हम परेशानियों का बोझा इस तरह से ढोते हैं कि हम कहीं भी जाएं, वे हमारा पीछा नहीं छोड़तीं। इससे न केवल हम खुद परेशान रहते हैं, बल्कि अपने आसपास के माहौल को भी तनाव भरा बना देते हैं। इसलिए हमें इस प्रवृत्ति पर काबू पाना ज़रूरी है, वरना यह विक्रम के बेताल की तरह पीठ पर लदी हर जगह पहुँच जाएगी। अतः जहाँ की चीज़ हो, उसे वहीं तक सीमित रहने दो। आफिस से निकलो तो वहां की परेशानियाँ भूलकर और घर से निकलो तो घर की।
     दूसरी बात, नकारात्मक विचारों से सफलतता मिलना उतना ही असंभव है, जितना कि बबूल के पेड़ पर आम का लगना। हम अपने नकारात्मक विचारों के जाल में इस तरह उलझते जाते हैं कि चाहकर भी उससे मुक्त नहीं हो पाते। केवल सोच की वजह से ही वह व्यक्ति उस स्थान से खाली हाथ लौट आया, जहाँ पर उसे दुनियाँ भर की खुशियाँ मिल सकती थी। इसलिए जीवन में आगे बढ़ने की सोच रहे लोगों के लिए यह ज़रूरी है कि पहले अपनी सोच का दायरा बढ़ाएँ क्योंकि सोच में इतनी शक्ति होती है कि आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही बन सकते हैं। यानी कल्पवृक्ष स्वर्ग में नहीं, हमारे भीतर ही है जो मन में उत्पन्न विचारों के अनुसार फल देता रहता है। इसलिए ज़रूरी है कि आप विचारों को नियंत्रित करें, विचार आपको नहीं।